मुंबई: बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) के चुनाव परिणामों ने महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा उलटफेर कर दिया है। 20 साल बाद एकजुट हुए चचेरे भाई उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे का गठबंधन महायुति (बीजेपी-एकनाथ शिंदे शिवसेना) के सामने फीका पड़ गया। महायुति ने कुल 227 वार्डों में से 118 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया, जबकि ठाकरे गुट सिमटकर 71 सीटों पर रह गया।
यह चुनाव देश की सबसे अमीर नगर निगम BMC पर नियंत्रण के लिए लड़ा गया था। बाल ठाकरे की विरासत को बचाने और मराठी वोटों को एकजुट करने के उद्देश्य से उद्धव ठाकरे (शिवसेना यूबीटी) और राज ठाकरे (एमएनएस) ने हाथ मिलाया था, लेकिन यह रणनीति कामयाब नहीं हुई। उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) को 65 सीटें मिलीं, जबकि राज ठाकरे की एमएनएस मात्र 6 सीटों पर सिमट गई। शरद पवार की एनसीपी (एसपी) का खाता भी खुल नहीं सका या बेहद कमजोर रहा।
महायुति में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनी, जिसने 89 सीटें जीतीं, जबकि एकनाथ शिंदे की शिवसेना को 29 सीटें मिलीं। यह जीत ठाकरे परिवार के 25-30 साल पुराने BMC पर वर्चस्व को समाप्त करती है। कांग्रेस ने अकेले लड़कर कुछ सीटें (लगभग 11-23) जीतीं, लेकिन कुल मिलाकर विपक्षी प्रदर्शन कमजोर रहा।
ठाकरे गठबंधन को झटका क्यों लगा?
- गैर-मराठी वार्डों में भारी नुकसान: राज ठाकरे के अतीत में गैर-महाराष्ट्रियों के प्रति कड़े रुख और हिंसक प्रचार (जैसे मराठी न बोलने वालों पर हमले) के कारण गैर-मराठी आबादी वाले इलाकों में वोटरों ने मुंह मोड़ लिया।
- वोट बैंक का बिखराव: मराठी वोट एकजुट होने की बजाय बंट गया। कुछ शिंदे गुट की ओर चले गए, जबकि मुस्लिम और अन्य अल्पसंख्यक वोटरों ने ठाकरे-राज गठबंधन को नकार दिया।
- विकास vs अस्मिता: महायुति ने विकास और अच्छे शासन पर फोकस किया, जबकि ठाकरे बंधुओं का ‘मराठी मानूस’ और अस्मिता का नैरेटिव पुराना पड़ गया।
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इस जीत को ‘इतिहास रचने’ वाला बताया और कहा कि महायुति ने 25 में से 29 नगर निगमों में बहुमत हासिल किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी महाराष्ट्र के लोगों का आभार जताया। एकनाथ शिंदे ने कहा कि मुंबईकरों ने 25 साल के पुराने शासन के खिलाफ ‘विकास ब्रांड’ चुना।
