उत्तराखंड में ग्रासरूट मॉडल से ग्रामीण आपदा एवं स्वास्थ्य तैयारियों को मिली अंतरराष्ट्रीय पहचान

by
  • उत्तराखंड का सामुदायिक आपदा प्रबंधन मॉडल बन सकता है राष्ट्रीय मॉडल

देहरादून : उत्तराखंड में विकसित एक सामुदायिक आधारित आपदा तैयारी मॉडल को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है। इसे संयुक्त राष्ट्र आपदा जोखिम न्यूनीकरण कार्यालय (UNDRR) के ‘प्रिवेंशन’ वेब प्लेटफॉर्म पर प्रकाशित किया गया है, जहां इसे ग्रामीण भारत में जमीनी स्तर पर लचीलापन बढ़ाने के एक प्रभावी मॉडल के रूप में रेखांकित किया गया है।

“Transforming Community Disaster Preparedness: PHEDM Model Evaluation in Uttarakhand, India” शीर्षक से किए गए इस अध्ययन का नेतृत्व प्रांतीय चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवा के वरिष्ठ चिकित्साधिकारी एवं वर्तमान में एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम (IDSP) के सहायक निदेशक डॉ. पंकज कुमार सिंह ने किया। इसमें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के शोधकर्ताओं का भी सहयोग रहा। यह अध्ययन International Journal of Disaster Studies and Climate Resilience में प्रकाशित हुआ है।

डॉ. सिंह ने कहा, “यह भारत में एक राष्ट्रीय मॉडल के रूप में अपनाया जा सकता है।” अध्ययन ऐसे समय सामने आया है जब मानसून के दौरान बाढ़ और भूस्खलन जैसी आपदाएं उत्तराखंड को बार-बार प्रभावित करती रही हैं। यह शोध दर्शाता है कि ग्राम पंचायतों और स्थानीय समुदायों को सशक्त बनाकर संवेदनशील ग्रामीण क्षेत्रों में आपदा और जनस्वास्थ्य आपात स्थितियों के लिए तैयारी को उल्लेखनीय रूप से बेहतर किया जा सकता है।

उधम सिंह नगर जिले की दो ग्राम पंचायतों में किए गए इस अध्ययन में तुलनात्मक पद्धति अपनाई गई, जिसमें एक हस्तक्षेप वाले गांव और एक नियंत्रण वाले गांव का मूल्यांकन Public Health Emergency & Disaster Management (PHEDM) ढांचे के अंतर्गत किया गया। इस मॉडल के पहले दो स्तर, सामुदायिक तैयारी और पंचायत स्तर पर समन्वय, को सात चरणों की संरचित प्रक्रिया के माध्यम से लागू किया गया, जिसमें जोखिम आँकलन, प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण शामिल था।

अध्ययन के निष्कर्षों में हस्तक्षेप वाले गांव में उल्लेखनीय सुधार सामने आया। जल, स्वच्छता और स्वच्छ व्यवहार (WASH) सेवाओं की कवरेज 73 प्रतिशत से बढ़कर 95 प्रतिशत हो गई, जबकि आपदा मॉक ड्रिल में भागीदारी 12 प्रतिशत से बढ़कर 68 प्रतिशत तक पहुंच गई। साथ ही, सामुदायिक आपात प्रतिक्रिया दल (CERT) के प्रशिक्षित सदस्यों की संख्या में भी वृद्धि हुई और समग्र तैयारी व अनुकूलन क्षमता में सुधार दर्ज किया गया। इसके विपरीत, नियंत्रण पंचायत में इन संकेतकों में कोई विशेष परिवर्तन नहीं देखा गया।

शोधकर्ताओं ने इन सुधारों का श्रेय लक्षित हस्तक्षेपों को दिया, जिनमें ग्राम आपदा प्रबंधन योजना का निर्माण, CERT और सामुदायिक आपात प्रबंधन टीम (CEMT) का गठन, जोखिम आधारित माइक्रो-प्लानिंग और नियमित मॉक अभ्यास शामिल हैं। अध्ययन में Threat and Hazard Identification and Risk Assessment (THIRA) पद्धति को भी स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप ढालते हुए विशेषज्ञों, जिला प्रशासन और समुदाय के साथ परामर्श के आधार पर लागू किया गया।

शोधकर्ताओं के अनुसार, पंचायतों की सक्रिय भागीदारी से समुदाय में विश्वास, सहभागिता और स्वामित्व की भावना मजबूत हुई, जिससे कोविड-19 जैसी स्वास्थ्य आपात स्थितियों में भी बेहतर प्रतिक्रिया संभव हुई। अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि PHEDM मॉडल को राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने की व्यापक संभावनाएं हैं। स्थानीय स्तर पर जोखिम आकलन, सामुदायिक प्रशिक्षण और मॉक अभ्यास को संस्थागत रूप देने से ग्रामीण भारत में आपदा तैयारी को सशक्त किया जा सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस मॉडल को पंचायती राज संस्थाओं, जिला आपदा प्रबंधन योजनाओं और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के साथ एकीकृत करने से आपदा के समय त्वरित प्रतिक्रिया और समन्वय बेहतर होगा। अध्ययन में यह भी सुझाव दिया गया है कि डिजिटल तकनीकों, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग जैसे उभरते उपकरणों के उपयोग से भविष्य में आपदा तैयारी को और सुदृढ़ किया जा सकता है।

जलवायु परिवर्तन के कारण आपदाओं की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ने के बीच, शोधकर्ताओं का कहना है कि PHEDM जैसे सामुदायिक आधारित मॉडल आत्मनिर्भर और लचीले ग्रामीण समाज के निर्माण की दिशा में एक व्यावहारिक मार्ग प्रस्तुत करते हैं, जो भारत के सतत और समावेशी विकास के व्यापक लक्ष्य के अनुरूप है।

Related Posts