18,600 फीट की ऊंचाई पर सेना का साहसिक रेस्क्यू, खड़ी ढलान पर एक स्किड टिकाकर मरीज को निकाला

by
  • नुन-कुन पर्वत श्रृंखला के पास तेज हवाओं और बेहद कम लैंडिंग स्पेस के बीच भारतीय सेना के एविएशन पायलटों ने चलाया सफल मेडिकल रेस्क्यू ऑपरेशन।

नई दिल्ली। भारतीय सेना के एविएशन पायलटों ने नुन-कुन पर्वत श्रृंखला के पास करीब 18,600 फीट की ऊंचाई पर बेहद चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में एक घायल व्यक्ति का सफल मेडिकल रेस्क्यू किया। तेज पहाड़ी हवाओं, खड़ी ढलान और सीमित लैंडिंग स्पेस के बावजूद पायलटों ने असाधारण सूझबूझ और तकनीकी दक्षता का परिचय देते हुए मरीज को सुरक्षित एयरलिफ्ट किया।

यह ऑपरेशन शनिवार को उस समय किया गया, जब ऊंचाई वाले क्षेत्र में दिन की रोशनी तेजी से कम हो रही थी। ऐसे में रेस्क्यू टीम के पास अभियान पूरा करने के लिए बेहद कम समय उपलब्ध था। भारतीय सेना की फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर इस साहसिक अभियान की जानकारी साझा की।

ऊंचाई ने बढ़ाई चुनौती

18,600 फीट की ऊंचाई पर वायुमंडलीय दबाव और हवा का घनत्व काफी कम होता है। इसका सीधा असर हेलिकॉप्टर के इंजन के प्रदर्शन और रोटर से मिलने वाली लिफ्ट पर पड़ता है। इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए हेलिकॉप्टर से गैर-जरूरी उपकरण हटाकर उसका वजन कम किया गया। साथ ही केवल आवश्यक मात्रा में ईंधन रखा गया, ताकि हेलिकॉप्टर की ऊंचाई पर प्रदर्शन और रेस्क्यू क्षमता बेहतर बनी रहे। हालांकि, मरीज को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाने के लिए पर्याप्त ईंधन सुनिश्चित किया गया।

खड़ी ढलान पर एक स्किड टिकाकर बचाई जान

घटनास्थल पर पहुंचने के बाद पायलटों के सामने सबसे बड़ी चुनौती हेलिकॉप्टर को उतारने के लिए पर्याप्त जगह नहीं होना था। पहाड़ी ढलान बेहद खड़ी थी और तेज हवाएं चल रही थीं। ऐसे में सामान्य तरीके से हेलिकॉप्टर को लैंड कराना संभव नहीं था।

पायलटों ने हेलिकॉप्टर को बेहद कम ऊंचाई पर स्थिर रखते हुए एक बेहद जोखिमपूर्ण तकनीकी प्रक्रिया अपनाई। हेलिकॉप्टर का सिर्फ एक स्किड खड़ी ढलान पर टिकाया गया, जबकि हेलिकॉप्टर पूरी तरह जमीन पर नहीं उतरा। इसी स्थिति में रेस्क्यू कर्मियों ने तेजी से मरीज को हेलिकॉप्टर के भीतर सुरक्षित किया।

मरीज को सुरक्षित लेने के बाद हेलिकॉप्टर ने तत्काल उड़ान भरी और उसे सुरक्षित स्थान तक पहुंचाया गया।

आखिरी लैंडिंग विंडो का किया इस्तेमाल

सेना के मुताबिक, यह अभियान उस समय अंजाम दिया गया जब इलाके में उपलब्ध आखिरी सुरक्षित लैंडिंग विंडो तेजी से खत्म हो रही थी। सीमित समय, तेज हवाओं और अत्यधिक ऊंचाई के बीच पायलटों ने सटीक उड़ान नियंत्रण के साथ ऑपरेशन को सफल बनाया।

भारतीय सेना ने इस रेस्क्यू को एविएशन विंग की ऑपरेशनल तैयारी, तकनीकी दक्षता और कठिन पर्वतीय क्षेत्रों में जीवन बचाने की प्रतिबद्धता का उदाहरण बताया है। 18,600 फीट की ऊंचाई पर बिना पर्याप्त लैंडिंग स्पेस के इस तरह का रेस्क्यू अभियान सेना के पायलटों के उच्चस्तरीय प्रशिक्षण और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में निर्णय लेने की क्षमता को भी दर्शाता है।

Related Posts