हत्या ‘जघन्य अपराध’ की श्रेणी में, किशोरों पर भी वयस्क की तरह चलेगा मुकदमा : सुप्रीम कोर्ट

by

नई दिल्ली। किशोर अपराधियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक बड़ा और अहम फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि भारतीय दंड संहिता की धारा 302, जो अब भारतीय न्याय संहिता की धारा 103(1) है, के तहत हत्या का अपराध किशोर न्याय अधिनियम, 2015 के तहत “जघन्य अपराध” (Heinous Offence) की श्रेणी में ही आएगा। कोर्ट ने कहा कि हत्या के मामले में आजीवन कारावास निहित न्यूनतम सजा है, भले ही कानून में यह स्पष्ट शब्दों में न लिखा गया हो।

बिहार मामले में क्या हुआ फैसला

यह फैसला न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान की पीठ ने बिहार के एक हत्या मामले की सुनवाई करते हुए दिया। इस मामले में पटना हाईकोर्ट ने आदेश दिया था कि हत्या के आरोपी किशोर पर बाल न्यायालय (Children’s Court) में वयस्क की तरह मुकदमा चलाया जाए। आरोपी ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया और हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के 3 बड़े निष्कर्ष

1. हत्या जघन्य अपराध है: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 302/103 के तहत हत्या का अपराध जघन्य अपराध है, क्योंकि इसके लिए न्यूनतम सजा आजीवन कारावास है।

2. विशेषज्ञों की राय अनिवार्य नहीं: कोर्ट ने कहा कि किशोर न्याय अधिनियम की धारा 101(2) के तहत अपील पर सुनवाई के दौरान मनोवैज्ञानिक या चिकित्सा विशेषज्ञों की मदद लेना अदालत का विवेकाधिकार है, यह कोई अनिवार्य प्रक्रिया नहीं है।

3. जुवेनाइल बोर्ड की जिम्मेदारी: जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड को धारा 15 के तहत प्रारंभिक जांच में मामले के सभी जरूरी पहलुओं पर स्वयं विचार और मूल्यांकन करना चाहिए।

Related Posts